भारत से हम क्या सीखें


                           
      फ्रेड्रिक मैक्समूलर
जन्म :   6 दिसंबर 1823 ई०                            
      फ्रेड्रिक मैक्समूलर

जन्म :   6 दिसंबर 1823 ई०

जन्म स्थान : जर्मनी के डेसाउ नामक नगर में
पिता :  विल्हेल्म मूलर 
Notes :  18 वर्ष की उम्र में लिपजिंग विश्वविद्यालय में उन्होंने संस्कृत का अध्ययन आरंभ कर दिया ।
उन्होंने 'हितोपदेश', 'कठ' और 'केन' उपनिषदों का जर्मन भाषा में अनुवाद किया तथा 'मेघदूत' का जर्मन पद्यानुवाद किया।
स्वामी विवेकानंद ने

उन्हें 'वेदांतियों का भी वेदांती' कहा ।
उनके प्रकाण्ड पांडित्य से प्रभावित होकर साम्राज्ञी विक्टोरिया ने 1868 ई० में उन्हें अपने ऑस्बोर्न प्रासाद में ऋग्वेद तथा संस्कृत के साथ यूरोपियन भाषाओं की तुलना आदिविषयों पर व्याख्यान देनेके लिएआमंत्रित किया था । उस भाषण को सुनकर विक्टोरिया इतनी प्रभावित हुईं कि उन्हें 'नाइट' की
उपाधि प्रदान कर दी,
मैक्समूलर का निधन :28 अक्टूबर 900 ई० में
प्रस्तुत
आलेख वस्तुतः भारतीय सिविल सेवा हेतु चयनित युवा अंग्रेज अधिकारियों के आगमन के
सवसर पर संबोधित भाषणों की श्रृंखला की एक कड़ी है । प्रथम भाषण का यह अविकल रूप से संक्षिप्त
वं संपादित अंश है जिसका भाषांतरण डॉ0 भवानीशंकर त्रिवेदी ने किया है । भाषण में मैक्समूलर ने भारत
को प्राचीनता और विलक्षणता का प्रतिपादन करते हुए नवागंतुक अधिकारियों को यह बताया कि विश्व की
भ्यता भारत से बहुत कुछ सीखती और ग्रहण करती आयी है । उनके लिए भी यह एक सौभाग्यपूर्ण अवसर
कि वे इस विलक्षण देश और उसकी सभ्यता-संस्कृति से बहुत कुछ सीख-जान सकते हैं । यह भाषण
ज भी उतना ही प्रासंगिक है, बल्कि स्वदेशाभिमान के विलोपन के इस दौर में इस भाषण की विशेष
र्थकता है । नई पीढ़ी अपने देश तथा इसकी प्राचीन सभ्यता-संस्कृति, ज्ञान-साधना, प्राकृतिक वैभव आदि
महत्ता का प्रामाणिक ज्ञान प्रस्तुत भाषण से प्राप्त कर सकेगी

जन्म स्थान : जर्मनी के डेसाउ नामक नगर में
पिता :  विल्हेल्म मूलर 
Notes :  18 वर्ष की उम्र में लिपजिंग विश्वविद्यालय में उन्होंने संस्कृत का अध्ययन आरंभ कर दिया ।
उन्होंने 'हितोपदेश', 'कठ' और 'केन' उपनिषदों का जर्मन भाषा में अनुवाद किया तथा 'मेघदूत' का जर्मन पद्यानुवाद किया।
स्वामी विवेकानंद ने

उन्हें 'वेदांतियों का भी वेदांती' कहा ।
उनके प्रकाण्ड पांडित्य से प्रभावित होकर साम्राज्ञी विक्टोरिया ने 1868 ई० में उन्हें अपने ऑस्बोर्न प्रासाद में ऋग्वेद तथा संस्कृत के साथ यूरोपियन भाषाओं की तुलना आदिविषयों पर व्याख्यान देनेके लिएआमंत्रित किया था । उस भाषण को सुनकर विक्टोरिया इतनी प्रभावित हुईं कि उन्हें 'नाइट' की
उपाधि प्रदान कर दी,
मैक्समूलर का निधन :28 अक्टूबर 900 ई० में
प्रस्तुत
आलेख वस्तुतः भारतीय सिविल सेवा हेतु चयनित युवा अंग्रेज अधिकारियों के आगमन के
सवसर पर संबोधित भाषणों की श्रृंखला की एक कड़ी है । प्रथम भाषण का यह अविकल रूप से संक्षिप्त
वं संपादित अंश है जिसका भाषांतरण डॉ0 भवानीशंकर त्रिवेदी ने किया है । भाषण में मैक्समूलर ने भारत
को प्राचीनता और विलक्षणता का प्रतिपादन करते हुए नवागंतुक अधिकारियों को यह बताया कि विश्व की
भ्यता भारत से बहुत कुछ सीखती और ग्रहण करती आयी है । उनके लिए भी यह एक सौभाग्यपूर्ण अवसर
कि वे इस विलक्षण देश और उसकी सभ्यता-संस्कृति से बहुत कुछ सीख-जान सकते हैं । यह भाषण
ज भी उतना ही प्रासंगिक है, बल्कि स्वदेशाभिमान के विलोपन के इस दौर में इस भाषण की विशेष
र्थकता है । नई पीढ़ी अपने देश तथा इसकी प्राचीन सभ्यता-संस्कृति, ज्ञान-साधना, प्राकृतिक वैभव आदि
महत्ता का प्रामाणिक ज्ञान प्रस्तुत भाषण से प्राप्त कर सकेगी

Comments

Popular posts from this blog

पाठ -2 उसने कहा था 12th

ढहते विश्वास’

महत्वपूर्ण सब्जेक्टिव प्रश्न हिंदी 10th