Histry Long Ans Type Questions


Histry Long Ans Type Questions
1. राष्ट्रवाद के उदय के कारणों एवं प्रभाव की चर्चा करें।
उत्तर :-
*कारण:- यूरोप में राष्ट्रीयता की भावना को 1789 की फ्रांसीसी क्रांति तथा नेपोलियन की विजयों ने बढ़ावा दिया। फ्रांसीसी क्रांति ने कुलीन वर्ग के हाथों से राजनीति को सर्वसाधारण एवं मध्यमवर्ग तक पहुँचा दिया। नेपोलियन ने विजित राज्यों में राष्ट्रवादी भावना जागृत कर दी। साथ ही नेपोलियन के युद्धों और विजयों से अनेक राष्ट्रों में फ्रांसीसी आधिपत्य के विरुद्ध आक्रोश पनपा, जिससे राष्ट्रवाद का विकास हुआ।

*प्रभाव :- 18वीं एवं 19वीं शताब्दियों में यूरोप में जिस राष्ट्रवाद की लहर चली, उसके व्यापक और दूरगामी प्रभाव यूरोप और विश्व पर पड़े जो निम्नलिखित थे—
(i) राष्ट्रीयता की भावना से प्रेरित होकर अनेक राष्ट्रों में क्रांतियाँ और आंदोलन हुए। इनके फलस्वरूप अनेक नए राष्ट्रों का उदय हुआ, जैसे
इटली और जर्मनी के एकीकृत राष्ट्र।
(ii) यूरोपीय राष्ट्रवाद के विकास का प्रभाव एशिया और अफ्रीका में भी
पड़ा। यूरोपीय उपनिवेशों के आधिपत्य के विरुद्ध वहाँ भी औपनिवेशिक
शासन से मुक्ति के लिए राष्ट्रीय आंदोलन आरंभ हो गए।
(iii) राष्ट्रवाद के विकास ने प्रतिक्रियावादी शक्तियों और निरंकुश शासकों का
प्रभाव कमजोर कर दिया।


2.जर्मनी के एकीकरण में बिस्मार्क की भूमिका का वर्णन करें।

उत्तर :- फ्रेडरिक विलियम चतुर्थ की मृत्यु के बाद प्रशा का राजा विलियम प्रथम बना। वह राष्ट्रवादी था तथा प्रशा के नेतृत्व में जर्मनी का एकीकरण करना चाहता था। विलियम जानता था कि आस्ट्रिया और फ्रांस को पराजित किए बिना जर्मनी का एकीकरण संभव नहीं है। अत: उसने 1862 ई० में ऑटोवॉन बिस्मार्क को अपना चांसलर (प्रधानमंत्री) नियुक्त किया। बिस्मार्क प्रख्यात राष्ट्रवादी और कूटनीतिज्ञ था। जर्मनी के एकीकरण के लिए वह किसी भी कदम को अनुचित नहीं मानता था। उसने जर्मन राष्ट्रवादियों के सभी समूहों से संपर्क स्थापित कर उन्हें अपना प्रभाव में लाने का प्रयास किया। बिस्मार्क का मानना था कि जर्मनी की समस्या का समाधान बौद्धिक भाषणों से नहीं, आदर्शवाद से नहीं वरन् प्रशा के नेतृत्व में रक्त और लौह की नीति से होगा। 1871 ई० में फ्रैंकफर्ट की संधि द्वारा दक्षिणी राज्य उत्तरी जर्मन महासंघ में मिल गए। अंततोगत्वा जर्मनी 1871 ई० में एक एकीकृत राष्ट्र के रूप में यूरोप के मानचित्र पर उभरकर सामने आया। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि जर्मनी के एकीकरण में बिस्मार्क की भूमिका काफी महत्त्वपूर्ण थी।


3.इटली के एकीकरण में मेजिनी के योगदान को बतायें।

उत्तर–इटली के एकीकरण में मेजिनी_मेजिनी को इटली के एकीकरण का पैगम्बर कहा जाता है। वह दार्शनिक, लेखक, राजनेता, गणतंत्र का समर्थक एवं एक कर्मठ कार्यकर्ता था। उसका जन्म 1805 में सार्डिनिया के जिनोआ नगर में हुआ था। 1815 में जब जिनोआ को पिडमौंट के .अधीन कर दिया गया, तब इसका विरोध करने वालों में मेजिनी भी था। राष्ट्रवादी भावना से प्रेरित होकर उसने गुप्त क्रांतिकारी संगठन कार्बोनारी की सदस्यता ग्रहण की। अपने गणतंत्रवादी उद्देश्यों के प्रचार के लिए मेजिनी ने 1831 में मार्सेई में 'यंग इटली' तथा 1834 में बर्न में 'यंग यूरोप' की स्थापना की। इसका सदस्य युवाओं को बनाया गया। मेजिनी जन संप्रभुता के सिद्धांत में विश्वास रखता था। उसने 'जनार्दन जनता तथा इटली' का नारा दिया। उसका उद्देश्य आस्ट्रिया के प्रभाव से इटली को मुक्त करवाना तथा संपूर्ण इटली का एकीकरण करना था।


4.साम्यवाद के जनक कौन थे? समाजवाद एवं साम्यवाद में अंतर स्पष्ट करें।

उत्तर : साम्यवाद के जनक फ्रेडरिक एंगेल्स तथा कार्ल मार्क्स थे। समाजवाद एक ऐसी विचारधारा है जिसने आधुनिक काल में समाज को एक नया रूप प्रदान किया। औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप समाज में पूँजीपति वर्गों द्वारा मजदूरों का शोषण अपने चरमोत्कर्ष पर था। उन्हें इस शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने तथा वर्गविहिन समाज करने में समाजवादी विचारधारा ने अग्रणी भूमिका अदा की। समाजवाद उत्पादन में मुख्यतः निजी स्वामित्व की जगह सामूहिक स्वामित्व या धन के समान वितरण पर जोर देता है। यह एक शोषण-उन्मुक्त समाज की स्थापना चाहता है। आरंभिक समाजवादियों में सेंट साइमन, चार्ल्स फूरिए, लुई ब्लाँ तथा राबर्ट ओवेन के नाम विशेष रूप से. उल्लेखनीय है। ये सभी समाजवादी उच्च और व्यवहारिक आदर्श से प्रभावित होकर 'वर्ग संघर्ष' की नहीं बल्कि 'वर्ग समन्वय' की बात करते थे।

दूसरे प्रकार के समाजवादियों में फ्रेडरिक एंगेल्स, कार्ल मार्क्स और उनके बाद के चिंतक 'साम्यवादी' कहलाए। ये लोग समन्वय के स्थान पर वर्ग संघर्ष की बात की। इन लोगों ने समाजवाद की एक नई व्याख्या प्रस्तुत की जिसे वैज्ञानिक समाजवाद कहा जाता है। मार्क्सवादी दर्शन साम्यवाद के नाम से विख्यात हुआ। मार्क्स का मानना था कि मानव इतिहास 'वर्ग संघर्ष' का इतिहास है। इतिहास उत्पादन के साध । नों पर नियंत्रण के लिए दो वर्गों के बीच चल रहे निरंतर संघर्ष की कहानी है।


5. कार्ल मार्क्स की जीवनी एवं सिद्धांतों का वर्णन करें।

उत्तर-कार्ल मार्क्स का जन्म 5 मई, 1818 ई० को जर्मनी में राइन प्रांत के ट्रियर - नगर में एक यहूदी परिवार में हुआ था। समाजवादी विचारधारा को आगे बढ़ाने में कार्ल मार्क्स की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। मार्क्स पर रूसो, मॉटेस्क्यू एवं हीगेल के विचारधारा का गहरा प्रभाव था। मार्क्स और एंगेल्स ने मिलकर 1848 में कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो अथवा साम्यवादी घोषणा-पत्र प्रकाशित किया। मार्क्स ने पूँजीवाद की घोर भर्त्सना की और श्रमिकों के हक की बात उठाई। मजदूरों को अपने हक के लिए लड़ने को उसने उत्प्रेरित किया। मार्क्स ने 1867 ई० में "दास-कैपिटल" नामक पुस्तक की रचना की जिसे 'समाजवादियों का बाइबिल' कहा जाता है। मार्क्सवादी दर्शन साम्यवाद (Communism) के नाम से विख्यात हुआ।

मार्क्स के सिद्धांत _ (i) द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का सिद्धांत, (ii) वर्ग संघर्ष का सिद्धांत, (iii) इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या, (iv) मूल्य एवं अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत, (v) राज्यहीन व वर्गहीन समाज की स्थापना।


6. लेनिन के जीवन एवं उपलब्धियों की समीक्षा करें।

उत्तर :- बोल्शेविक क्रांति का प्रणेता लेनिन था। उसका पूरा नाम ब्लादिमीर इलिच अलयानोव था। उसका जन्म 10 अप्रैल, 1870 को बोल्गा नदी के किनारे स्थित सिमब्रस्क नामक गाँव में हुआ था। विद्यार्थी जीवन से ही वह मार्क्सवाद से प्रभावित होकर इसका कट्टर समर्थक बन गया। वह रूस की तत्कालीन स्थिति से क्षुब्ध था और प्रचलित व्यवस्था की समाप्ति चाहता था। उसने बोल्शेविक दल का नेतृत्व ग्रहण किया। ट्रॉटस्की के सहयोग से उसने करेन्सकी की सरकार का तख्ता पलट दिया। शासन संभालते ही उसने अपने उद्देश्य और कार्यक्रम निश्चित किए। उसका उद्देश्य रूस का नवनिर्माण करना था। .

लेनिन की उपलब्धियाँ :-
(i) सर्वप्रथम लेनिन ने जर्मनी के साथ युद्ध बंद कर दिया। 1918 में रूस ने
जर्मनी के साथ ब्रेस्टलिटोवस्क की संधि कर ली।
(ii) लेनिन ने चेका नामक गुप्त पुलिस दस्ता का गठन कर तथा ट्रॉटस्की ने
लाल सेना का गठन कर विदेशी सेना को रूस से बाहर खदेड़कर रूस
के आंतरिक विद्रोहियों का दमन कर दिया।
(iii) बोल्शेविक सरकार ने नई आर्थिक नीति की व्यवस्था की। राष्ट्र की सारी
संपत्ति तथा उत्पादन और वितरण के साधनों पर सरकारी आधिपत्य
स्थापित किया गया।
(iv) लेनिन ने 1921 में एक नई आर्थिक नीति (NEP) लागू की। इसके अनुसार
सीमित रूप से किसानों और पूँजीपतियों को व्यक्तिगत संपत्ति रखने की अनुमति दी गई। खेती की पैदावार बढ़ी तथा उद्योग धंधों में भी उत्पादन बढ़ा। इससे रूस समृद्धि के पथ पर आगे बढ़ा।


7. हिन्द-चीन उपनिवेश स्थापना का उद्देश्य क्या था ?
अथवा, हिन्द-चीन में फ्रांसीसियों द्वारा उपनिवेश स्थापना के किन्हीं तीन उद्देश्यों का उल्लेख करें।

उत्तर- फ्रांस द्वारा हिन्द-चीन में उपनिवेश स्थापना के उद्देश्य इस प्रकार थे
(i) व्यापारिक प्रतिस्पर्धा-फ्रांस द्वारा हिन्द-चीन में उपनिवेश स्थापना का मुख्य उद्देश्य डच एवं ब्रिटिश कंपनियों के व्यापारिक प्रतिस्पर्धा का सामना करना था। भारत में फ्रांसीसी पिछड़ रहे थे तथा चीन में उनके व्यापारिक प्रतिद्वंद्वी मुख्यतः अंग्रेज थे। अतः सुरक्षात्मक आधार के रूप में उन्हें हिन्द-चीन का क्षेत्र उचित लगा जहाँ से वे भारत एवं चीन दोनों तरफ कठिन परिस्थितियों को संभाल सकते थे।
(ii) कच्चे माल तथा बाजार की उपलब्धता-औद्योगिक क्रांति के बाद विभिन्न उद्योगों के सुचारुपूर्वक संचालन के लिए भारी मात्रा में कच्चा माल तथा तैयार उत्पादों की खपत हेतु बाजार की आवश्यकता थी। अतः इन दोनों आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उपनिवेश की स्थापना आवश्यक हो गई।
(iii) गोरे होने का दायित्व यूरोपीय गोरे लोगों का यह स्वघोषित दायित्व था कि वे पिछड़े काले लोगों के समाज को सभ्य बनाएँ। वे इसे ईश्वर प्रदत्त दायित्व . समझते थे।
इसके अतिरिक्त कैथोलिक धर्म का प्रचार भी उपनिवेश स्थापना का एक उद्देश्य था।


6. माई-ली गाँव की घटना क्या थी ? इसका क्या प्रभाव पड़ा ?

उत्तर--1968 में युद्ध के दौरान दक्षिण वियतनाम के एक गाँव माई-ली में लोमहर्षक घटना घटी। अमेरिकी सेना ने अपनी पराजय की बौखलाहट में इस गाँव पर आक्रमण कर दिया। पूरे गाँव को घेरकर पुरुषों को मार दिया गया। स्त्रियाँ, यहाँ तक कि बच्चियों के साथ सामूहिक बलात्कार कर उनकी भी हत्या कर दी गई। उसके बाद पूरे गाँव को आग लगाकर जला दिया गया। समाचार-पत्रों ने इस घटना का विवरण छापा। इससे अमेरिका के प्रति तीखी प्रतिक्रिया हुई तथा अमेरिकन प्रशासन की कटु आलोचना हुई।

प्रभाव-अमेरिका ने वियतनामी युद्ध में जो नीति अपनाई उसकी तीखी भर्त्सना हुई। अमेरिका में ही नागरिक सरकारी नीतियों के विरोधी हो गए। वियतनाम में अमेरिका की विफलता स्पष्ट हो गयी। उसे न तो वियतनामी जनता का समर्थन मिला और न ही वियतनामियों के प्रतिरोध को दबा सका। अमेरिकी धन-जन की भी क्षति हुई। वियतनामी युद्ध को “पहला टेलीविजन युद्ध" कहा गया। युद्ध के लोमहर्षक दृश्यों को देखकर अमेरिका और राष्ट्रपति निक्सन की सर्वत्र आलोचना होने लगी। बढ़ते अंतर्राष्ट्रीय दबाव और आलोचना के वशीभूत राष्ट्रपति निक्सन ने 1970 में शांति वार्ता के लिए “पाँच सूत्री प्रस्ताव" प्रस्तुत किया।

7. असहयोग आंदोलन के कारण एवं परिणाम का वर्णन करें।

उत्तर-महात्मा गाँधी के नेतृत्व में प्रारंभ किया गया प्रथम जन-आंदोलन असहयोग आंदोलन था। इस आंदोलन के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे—
(i) रॉलेट कानून-1919 ई० में न्यायाधीश सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता में रालेट कानून (क्रांतिकारी एवं अराजकता अधिनियम) बना। इसके अनुसार किसी भी व्यक्ति को बिना कारण बताए गिरफ्तार कर जेल में डाला जा सकता था तथा इसके खिलाफ वह कोई भी अपील नहीं कर सकता था। .
(ii) जालियाँवाला बाग हत्याकांड-13 अप्रैल, 1919 ई० को बैसाखी मेले के अवसर पर पंजाब के जालियाँवाला बाग में सरकार की दमनकारी नीति के खिलाफ लोग एकत्रित हुए थे। जनरल डायर के द्वारा वहाँ पर निहत्थी जनता पर गोली चलवाकर हजारों लोगों की जाने ले ली गयी। गाँधीजी ने इस पर काफी प्रतिक्रिया व्यक्त किया।
(iii) खिलाफत आंदोलन—इसी समय खिलाफत का मुद्दा सामने आया। गाँधीजी ने इस आंदोलन को अपना समर्थन देकर हिंदू-मुस्लिम एकता स्थापित करने और एक बड़ा सशक्त अंग्रेजी राज विरोधी असहयोग आंदोलन आरंभ करने का निर्णय लिया।

परिणाम- 5 फरवरी, 1922 ई० को गोरखपुर के चौरी-चौरा नामक स्थान पर हिंसक भीड़ द्वारा थाने पर आक्रमण कर 22 पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी गयी। जिससे नाराज होकर गाँधीजी ने असहयोग आंदोलन को तत्काल बंद करने की घोषणा की। असहयोग आंदोलन का व्यापक प्रभाव पड़ा।
असहयोग आंदोलन के अचानक स्थगित हो जाने और गाँधीजी की गिरफ्तारी के कारण खिलाफत के मुद्दे का भी अंत हो गया। हिंदू-मुस्लिम एकता भंग हो गई तथा संपूर्ण भारत में संप्रदायिकता का बोलबाला हो गया। न ही स्वराज की प्राप्ति हुई और न ही पंजाब के अन्यायों का निवारण हुआ। असहयोग आंदोलन के परिणामस्वरूप ही मोतीलाल नेहरू तथा चितरंजन दास के द्वारा स्वराज पार्टी की स्थापना हुई।

8.औद्योगिकीकरण के परिणामस्वरूप होने वाले परिवर्तनों पर प्रकाश डालें।

उत्तर :- औद्योगिकीकरण के प्रभाव से यहाँ के आर्थिक एवं सामाजिक जीवन में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। ये परिवर्तन निम्नलिखित हैं -
(i) साम्राज्य-राष्ट्रवाद का विकास-औद्योगिकीकरण के कारण भारी मात्रा में कच्चे माल तथा उत्पादों की खपत हेतु बाजार की आवश्यकता थी। उपनिवेशों में ये दोनों ही उपलब्ध थे। उपनिवेशों की होड़ ने साम्राज्यवाद को जन्म दिया।
(ii) कुटीर उद्योगों का पतन-बड़े-बड़े कारखानों की स्थापना से प्राचीन लघु एवं कुटीर उद्योग का पतन हो गया। कुटीर उद्योग में तैयार माल महंगा तथा कारखाने में उत्पादित सामान सस्ता था। नतीजा यह हुआ कि कुटीर उद्योग समाप्त होने लगे क्योंकि बाजार में इसकी माँग घट गयी थी।
(iii) समाज में वर्ग विभाजन-औद्योगिकीकरण के फलस्वरूप समाज में तीन वर्गों का उदय हुआ—पूँजीपति, बुर्जुआ तथा मजदूर वर्ग।
(iv) स्लम पद्धति की शुरुआत-औद्योगिकीकरण के परिणामस्वरूप नवोदित फैक्ट्री मजदूर वर्ग शहर में छोटे-छोटे घरों में रहने लगे। जहाँ किसी प्रकार की सुविधा नहीं थी। इस प्रकार स्लम पद्धति की शुरुआत हुई।
(v) उद्योगों का विकास-औद्योगिकीकरण के कारण भारत में कारखानों की स्थापना एवं नये-नये यंत्रों का आविष्कार हुआ। विभिन्न उद्योगों से संबद्ध कारखाने खुले और उद्योगों का बड़े स्तर पर विकास हुआ। लोहा एवं इस्पात, कोयला, सीमेंट, चीनी, कागज, शीशा और अन्य उद्योग स्थापित हुए जिनमें बड़े स्तर' पर उत्पादन हुआ।

9. कुटीर उद्योग के महत्त्व एवं उपयोगिता पर प्रकाश डालें।

उत्तर :- भारत में औद्योगिकीकरण ने कुटीर उद्योगों को काफी क्षति पहुँचाई परंतु इस विषम परिस्थिति में भी गाँवों में यह उद्योग फल-फूल रहा था, जिसका लाभ आम जनता को मिल रहा था। महात्मा गाँधी के अनुसार लघु एवं कुटीर उद्योग भारतीय सामाजिक दशा के अनुकूल हैं। कुटीर उद्योग उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन से अत्यधिक संख्या में रोजगार उपलब्ध कराने में तथा राष्ट्रीय आय को बढ़ाने में जैसे महत्त्व से जुड़ा है। सामाजिक तथा आर्थिक समस्याओं का समाधान कुटीर उद्योगों द्वारा ही होता है। कुटीर उद्योग में बहुत कम पूँजी की आवश्यकता होती है। कुटीर उद्योग में वस्तुओं के उत्पादन करने की क्षमता कुछ लोगों के हाथ में न रहकर बहुत से लोगों के हाथ में रहती है। कुटीर उद्योग जनसंख्या को बड़े शहरों में पलायन को रोकता है। कुटीर उद्योग गाँवों को आत्मनिर्भर बनाने का एक औजार है।
औद्योगिकीकरण के विकास के पहले भारतीय निर्मित वस्तुओं का विश्वव्यापी बाजार था। भारतीय मलमल तथा छींट, सूती कपड़ों की माँग पूरे विश्व में थी। ब्रिटेन में भारतीय हाथों से बनी हुई वस्तुओं का ज्यादा महत्त्व दिया जाता था। हाथों से बने महीन धागों के कपड़े तसर सिल्क, बनारसी तथा बालुचेरी साड़ियाँ तथा बुने हुए बॉडर वाली साड़ियाँ एवं मद्रास की लुंगियों की माँग ब्रिटेन के उच्च वर्गों में अधिक थी। चूँकि ब्रिटिश सरकार की नीति भारत में विदेशी निर्मित वस्तुओं का आयात एवं भारत के कच्चा माल के निर्यात को प्रोत्साहन देना था, इसलिए ग्रामीण उद्योगों पर ध्यान नहीं दिया गया। फिर भी स्वदेशी आंदोलन के समय खादी जैसे वस्त्रों की माँग ने कुटीर उद्योग को बढ़ावा दिया।


10. शहरी जीवन में किस प्रकार के सामाजिक बदलाव आए ?

उत्तर :- शहरी जीवन के कारण विभिन्न प्रकार के सामाजिक बदलाव आए, जो निम्नलिखित हैं-

(i) शहरों में 'सामूहिक पहचान' के सिद्धांत को बढ़ावा मिला। ये समूह विभिन्न प्रजातियों, नजातियों, जातियों, प्रदेश, क्षेत्रीयता का प्रतिनिधित्व करते हैं। कम स्थान में विभिन्न प्रकार के लोगों के रहने से पहचान की भावना बढ़ती है।
(ii) शहरीकरण के कारण शहरों में नए सामाजिक समूह बने। ये समूह व्यावसायिक थे जैसे बुद्धिजीवी, नौकरी पेशा समूह, राजनीतिज्ञ, चिकित्सक, व्यापारी इत्यादि। व्यवसायी वर्ग नगरों के उदय का एक प्रमुख कारण बना।
(iii) शहरीकरण के कारण समाज के नये मध्यमवर्ग का उदय हुआ। यह वर्ग पढ़ा-लिखा था। इसके अधिकांश सदस्य या तो नौकरी पेशा से संबंधित थे अथवा स्वतंत्र व्यवसाय में कार्यरत थे जैसे वकील, डॉक्टर, लिपिक इत्यादि। ये नये सामाजिक परिवर्तनों को अपनाकर इनका प्रसार करते थे। समाज पर इनका व्यापक प्रभाव था।
(iv) शहरीकरण के कारण समाज में पूँजीपति वर्ग का भी उदय हुआ। अपनी
पूँजी के आधार पर ये उद्योगों को नियंत्रित करते थे। आर्थिक उन्मुक्तवाद की नीति का लाभ उठाकर इन लोगों ने अपार धन संग्रह किया था। ये मजदूरों का शोषण करते थे। इसलिए धीरे-धीरे इनके विरुद्ध मजदूरों में प्रतिक्रिया हुई और मजदूर आंदोलन हुए।
(v) शहरी जीवन ने श्रमिकों के जीवन स्तर में भी काफी बदलाव लाए । कारखानों और उद्योगों में रोजगार की तलाश में गाँवों से आकर बड़ी संख्या में भूमिहीन किसान और मजदूर शहरों में बसने लगे। इनके श्रम पर ही औद्योगिक इकाइयाँ चली। परंतु पूँजीपतियों ने श्रमिकों का शोषण किया। फलतः श्रमिक संगठित हुए और श्रमिक संघों की स्थापना की गई। श्रमिकों ने अपनी माँगों की पूर्ति के लिए समय-समय पर हड़ताल किये। इस प्रकार हड़ताल और श्रमिक आंदोलन आधुनिक शहरों की विशेषता बन गई।
शहरी जीवन ने औरतों के प्रति सोच में भी काफी बदलाव लाया। औरतों ने भी मताधिकार की माँग अथवा विवाहित स्त्रियों को संपत्ति में अधिकार देने के लिए आंदोलन चलाया।


11. ग्रामीण तथा नगरीय जीवन के बीच भिन्नताओं को स्पष्ट करें।

उत्तर :- ग्रामीण तथा शहरी या नगरीय जीवन के बीच दो मूलभूत अंतर देखा जाता है। प्रथम जनसंख्या का घनत्व और दूसरा कृषि आधारित आर्थिक क्रियाओं का अनुपात। नगरों में जनसंख्या का घनत्व ग्रामीण इलाकों से अधिक होता है। गाँवों में कम लोग ही अधिक स्थानों में रहते हैं परंतु नगरों में कम स्थानों में अधिक लोग रहते हैं। इसलिए गाँव जहाँ खुलापन लिए होते हैं वहीं शहर संकुचित एवं भीड़-भाड़ वाले होते हैं। नगरों और गाँवों में दूसरा मूलभूत अंतर कृषिजन्य क्रियाकलापों से संबंधित है। ग्रामीण जनसंख्या का एक बहुत बड़ा भाग कृषि और इसके उत्पाद पर आश्रित रहता है और वही इनकी आजीविका का मुख्य साधन होता है। इसके विपरीत शहरी जनसंख्या का अधिकांश भाग गैर-कृषि व्यवसायों विशेषकर नौकरी, उद्योग तथा व्यापारिक गतिविधियों में लगी रहती है। इसके अतिरिक्त ग्रामीण तथा शहरी जीवन की अर्थव्यवस्था एक-दूसरे से भिन्न होती है। शहरी अर्थव्यवस्था मुद्रा प्रधान अर्थव्यवस्था होती है। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तुलना में अधिक गतिशील होती है ।


12. शहरीकरण की प्रक्रिया में व्यवसायी वर्ग, मध्यम वर्ग एवं मजदूर वर्ग की भूमिका की चर्चा करें।

उत्तर- शहरीकरण की प्रक्रिया से समाज में विभिन्न वर्गों का अस्तित्व आया। शहरीकरण की प्रक्रिया में इन वर्गों की भूमिका क्रमानुसार इस प्रकार है-

# व्यवसायी वर्ग - शहरीकरण की प्रक्रिया के कारण व्यापार तथा वाणिज्य का विकास हुआ। नये-नये व्यवसायों के कारण विभिन्न व्यवसायी वर्ग का उदय हुआ। चूँकि व्यापार शहरों में ही होते थे इसलिए शहरों में ही विभिन्न व्यवसायी वर्ग अस्तित्व में आए। शहरों में यह व्यवसायी वर्ग एक नये सामाजिक शक्ति के रूप में उभरकर आए।

# मध्यम वर्ग - शहरीकरण के परिणामस्वरूप समाज के एक नये वर्ग मध्यम वर्ग का उदय हुआ। यह एक शिक्षित वर्ग था जो विभिन्न पेशों में रहकर भी औसतन एक समान आय प्राप्त करने वाला वर्ग के रूप में उभरकर सामने आया एवं बुद्धिजीवी वर्ग कहलाया। यह मध्यम वर्ग शहरों में विभिन्न रूपों में कार्यरत थे जैसे—शिक्षक, वकील, चिकित्सक, इंजीनियर, क्लर्क, एकाउंटेंट्स आदि। समाज पर इनका व्यापक प्रभाव था। ये राजनीतिक आंदोलन में भाग लेते थे एवं इसे नेतृत्व
भी प्रदान करते थे।

# मजदूर वर्ग - शहरीकरण की प्रक्रिया ने समाज में जहाँ एक ओर पूँजीपति वर्ग को जन्म दिया वहीं दूसरी ओर श्रमिक या मजदूर वर्ग को भी। कारखानेदारी प्रथा से शहरों में श्रमिक वर्ग का भी उदय और विकास हुआ। ये मजदूर वर्ग संगठित होकर अपना संगठन बनाये तथा अपनी मांगों के समर्थन में समय-समय पर हड़ताल भी किए। इस प्रकार हड़ताल और श्रमिक आंदोलन आधुनिक शहरों की विशेषता बन गई।


13. आर्थिक मंदी का अमेरिका, यूरोप तथा भारत पर हुए प्रभावों को इंगित करें ।

उत्तर -1929 ई० की आर्थिक संकट मंदी का प्रभाव अमेरिका, यूरोप सहित भारत पर भी पड़ा जो निम्नलिखित हैं-

(i) अमेरिका पर प्रभाव आर्थिक मंदी का सबसे बुरा परिणाम अमेरिका को झेलना पड़ा। मंदी के कारण बैंकों ने लोगों को कर्ज देना बंद कर दिया और दिए हुए कर्ज की वसूली तेज कर दी। कर्ज वापस नहीं हो पाने से बैंकों ने लोगों के सामानों को कुर्क कर लिया। कारोबार के ठप पड़ जाने से बेरोजगारी बढ़ी तथा कर्ज की वसूली नहीं होने पर बैंक बर्बाद हो गए।
(ii) यूरोप पर प्रभाव-इस आर्थिक मंदी से सबसे प्रभावित देश जर्मनी और ब्रिटेन था। फ्रांस इस मंदी से इसलिए बच गया क्योंकि उसे जर्मनी से काफी मात्रा में युद्ध हर्जाना की राशि प्राप्त हुई थी। जर्मनी में अराजकता फैल गयी जिसका लाभ उठाकर हिटलर ने अपने आपको सत्तासीन किया। 1929 के बाद ब्रिटेन के उत्पादन, निर्यात, रोजगार, आयात तथा जीवन निर्वाह स्तर पर सबमें तेजी से गिरावट आई।
(iii) भारत पर प्रभाव-इस आर्थिक महामंदी ने भारतीय व्यापार को काफी प्रभावित किया। 1928 से 1934 के बीच देश का आयात-निर्यात घटकर आधा हो गया। गेहूँ की कीमत में 50 प्रतिशत की गिरावट आई। कृषि मूल्य में कमी के बावजूद अंग्रेजी सरकार लगान की दरें कम करने को तैयार नहीं थी जिससे किसानों में असंतोष की भावना बढ़ी। आर्थिक मंदी भारत में सविनय अवज्ञा आंदोलन को जन्म दिया।

15. आज के परिवर्तनकारी युग स्वातंत्र्योत्तर भारत में प्रेस की भूमिका की व्याख्या करें।

उत्तर :- वैश्विक स्तर पर मुद्रण अपने आदिकाल से भारत में स्वाधीनता आंदोलन तक भिन्न-भिन्न परिस्थितियों से गुजरते हुए आज अपनी उपादेयता के कारण ऐसी स्थिति में पहुँच गया है जिससे ज्ञान जगत की हर गतिविधियाँ प्रभावित हो रही हैं। आज पत्रकारिता साहित्य, मनोरंजन, ज्ञान-विज्ञान, प्रशासन, राजनीति आदि को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर रहा है।
स्वातंत्र्योत्तर भारत में पत्र-पत्रिकाओं का उद्देश्य भले ही व्यावसायिक रहा हो, किंतु इसने साहित्यिक एवं सांस्कृतिक अभिरुचि जगाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है। पत्र-पत्रिकाओं ने दिन-प्रतिदिन घटनेवाली घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में नई और सहज शब्दावली का प्रयोग करते हुए भाषाशास्त्र के विकास में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। प्रेस ने समाज में नवचेतना पैदाकर सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक एवं दैनिक जीवन में क्रांति का सूत्रपात किया। प्रेस ने सदैव सामाजिक बुराइयों जैसे दहेज प्रथा, विधवा विवाह, बालिका विवाह, बालिकावधु, बाल हत्या, शिशु विवाह जैसे मुद्दों को उठाकर समाज की कुप्रथाओं को दूर करने में मदद की तथा व्याप्त अंधविश्वास को दूर करने का प्रयास किया। आज प्रेस समाज में रचनात्मकता का प्रतीक भी बनता जा रहा है। यह समाज की नित्यप्रति की उपलब्धियों, वैज्ञानिक अनुसंधानों, वैज्ञानिक उपकरणों एवं साधनों से परिचित कराता है। आज के आधुनिक दौर में प्रेस साहित्य और समाज की समृद्ध चेतना की धरोहर है। प्रेस लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने हेतु सजग प्रहरी के रूप में हमारे सामने खड़ा है।


16. वर्तमान समय (स्वतंत्र भारत) में प्रेस की भूमिका का वर्णन करें।

उत्तर :- स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद और वर्तमान समय में भी प्रेस भारतीय राजनीति समाज, आर्थिक और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के विकास में महत्त्वपूर्ण एवं प्रभावशाली भूमिका का निर्वहन कर रहा है। इसका प्रभाव प्रत्येक क्षेत्र में देखा जा सकता है। वह सूचना, मनोरंजन, शिक्षा, खेलकूद, सिनेमा, रंगमंच, अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं, सरकारी नीतियों, प्रादेशिक क्षेत्रीय और स्थानीय घटनाओं की जानकारी देनेवाला मुख्य माध्यम बन गया है। समाचारपत्रों ने साहित्यिक एवं सांस्कृतिक अभिरुचि जगाने में भी योगदान किया है। इसने सामाजिक सुधार कार्यक्रमों को भी प्रोत्साहित किया है। वर्तमान संदर्भ में प्रेस रचनात्मक भूमिका का भी निर्वहन कर रहा है। समाज के समक्ष आधुनिक वैज्ञानिक और दार्शनिक उपलब्धियों को रखकर यह नई चेतना और विश्वबंधुत्व की भावना जागृत कर रही है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने में मानवाधिकारों की सुरक्षा करने में तथा प्रशासनिक भ्रष्टाचारों को उजागर करने में प्रेस की प्रभावशाली भूमिका है। आज प्रेस स्वतंत्र है। यह सरकार पर नियंत्रण रखने का प्रभावशाली अस्त्र बन गया है।


17. 19वीं शताब्दी में भारत में प्रेस के विकास को रेखांकित करें।

उत्तर -19वीं शताब्दी में प्रेस ज्वलंत राजनीतिक एवं सामाजिक प्रश्नों को उठानेवाला एक सशक्त माध्यम बन गया। आधुनिक भारतीय प्रेस का आरंभ 1766 में विलियम बोल्टस द्वारा प्रकाशित समाचार-पत्र से माना जाता है। 1780 में जेम्स आगस्टस हिक्की ने अंग्रेजी भाषा में 'बंगाल गजट' नामक पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया। हिक्की के प्रेस को कंपनी ने जब्त कर लिया। नवम्बर, 1780 में प्रकाशित 'इंडिया गजट' दूसरा भारतीय पत्र था। भारतीयों द्वारा प्रकाशित प्रथम समाचार-पत्र 1816 में गंगाधर भट्टाचार्य का साप्ताहिक 'बंगाल गजट' था।

1821 में बंगाली में संवाद कौमुदी तथा 1822 में फारसी में प्रकाशित मिरातुल अखबार के साथ प्रगतिशील राष्ट्रीय प्रवृत्ति के समाचार-पत्रों का प्रकाशन आरंभ हुआ। इन समाचार पत्रों के संस्थापक राममोहन राय थे जो अंग्रेजी में ब्राझिनिकल मैंगजीन भी निकाला। 1822 में बंबई से. गुजराती भाषा में दैनिक बंबई समाचार निकलने लगे। द्वारकानाथ टैगोर, प्रसन्न कुमार टैगोर तथा राममोहन राय के प्रयास से 1830 में बंगदत्त की स्थापना हुई। 1831 में जामे जमशेद, 1851 में गोफ्तार तथा अखबारें सौदागर का प्रकाशन आरंभ हुआ। ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी भारतीय समाचार-पत्रों द्वारा सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक चेतना के विकास को शंका की दृष्टि से देखते थे। इसलिए 19वीं शताब्दी में भारतीय प्रेस को प्रतिबंधित कर का कुत्सित प्रयास किया।


18. राष्ट्रीय आंदोलन को भारतीय प्रेस ने कैसे प्रभावित किया ?

उत्तर :- भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के उद्भव एवं विकास में प्रेस की प्रभावशाली भूमिका रही। इसने राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं अन्य मुद्दों को उठाकर, उन्हें जनता के समक्ष लाकर उनमें राष्ट्रवादी भावना का विकास किया तथा लोगों में जागृति ला दी।
प्रेस में प्रकाशित लेखों और समाचार-पत्रों से भारतीय औपनिवेशिक शासन के वास्तविक स्वरूप से परिचित हुए। वे अंग्रेजों की प्रजातीय विभेद और शोषण की नीतियों से परिचित हुए। समाचार-पत्रों ने उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के घिनौने मुखौटा का पर्दाफाश कर दिया तथा इनके विरुद्ध लोकमत को संगठित किया। जनता को राजनीतिक शिक्षा देने का दायित्व समाचार-पत्रों ने अपने ऊपर ले लिया। समाचार-पत्रों ने देश में चलने वाले विभिन्न आंदोलनों एवं राजनीतिक कार्यक्रमों से जनता को परिचित कराया। कांग्रेस के कार्यक्रम हों या उसके अधिवेशन, बंग-भंग आंदोलन अथवा असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन समाचार पत्रों द्वारा लोगों को इनमें भाग लेने की प्रेरणा मिलती थी। कांग्रेस की भिक्षाटन की नीति का प्रेस ने विरोध किया तथा स्वदेशी और बहिष्कार की भावना को बढ़ावा देकर राष्ट्रवाद का प्रसार किया। इस प्रकार समाचार-पत्रों ने राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा दी। तिलक, ऐनीबेसेंट, महात्मा गाँधी और अन्य प्रभावशाली नेता प्रेस के माध्यम से ही जनता तक पहुँच सके। समाचार-पत्रों के माध्यम से आम जनता भी प्रेस और राष्ट्रवाद से जुड़ गयी।

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